शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013




तुम्हारा ना होना
तुम्हारा होना ज्यादा है
सुबूत तुम्हारे होने का
तुम्हारे ना होने में ज्यादा है
अदृश्य सा साथ
मेरे साए में लिपटा सा है
सुबह-शाम हो जाता है जो
मुझमें ही मेरे कद से बड़ा
दोपहर की सुनसान में
जज्ब होने लगता है
मुझमें मेरे बराबर होकर
और ..........
सब हटाकर, झटककर
रातों को वो जो नहीं है
सो जाता है, मुझमें ही आकर !

2 टिप्‍पणियां:

  1. मैं हूँ...तो तुम भी हो....

    सुन्दर एहसास..
    अनु

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  2. बहुत सुन्दर लेख .

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